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It was an afternoon, when a friend remarked why no pearls, why no gold ? I wanted to ask the same question why peals and why gold. Soon I had to leave to see a homeopath where these lines sprung to life sitting right in the consultation room. I am not reasoning here for something, I am just throwing the question back as a question, its a question against the norms that people have set. I refuse to abide for every sane reason of my mind and for every insane feeling of my heart.

Here it goes …

मेरी आंखो कि चमक, कजल से क्यूँ,

मेरी कलाई कि शोभा, किसी कंगन से क्यूँ,

मेरे गालो कि रंगत किसी गुलाल से क्यूँ,

मेरी कानो कि बाली का रंग पीला ही क्यूँ,

मेरे कदमों कि आहट किसी पायल से क्यूँ,

मेरे सौंदर्ये कि पहचान किसी मोती से क्यूँ,

मेरे इश्क़ कि निशानी किसी हीरे से क्यूँ,

मेरे अस्तित्व कि डोर किसी और के हातो में क्यूँ,

मेरा जीवन किसी का मोह्तज नहि,

मेरी सांसो कि कहानी मेरि अप्नि हि सहि.

ग़ुलबो कि कुश्बू मेरे मन मै बसि, मेरा ख्यालों कि सीमा आस्मा से बड़ी,

मेरा जीना सादगी कि लेहर से जुड़ा, मेरा होना सरल्ता कि निशनि से बना.

मै खुदा कि कुर्दत हूँ,  मैन सम्पूर्न, शश्वत क्रुति हूँ.

मैन हूँ, जो हूँ, मैन स्वम हूँ.

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